इस बार कुछ यूँ आना

इस बार कुछ यूँ आना

के ढलती शाम देख कर
जाने की ज़िद ना करनी पड़े,
बस एक इंतजार हो 
अगली सुबह की चाय की चुस्की का 


इस बार कुछ यूँ आना

के घड़ी में गुजरते वक़्त को देख कर
दिल घबराए नहीं, 
बल्कि एक एहसास हो 
इन ओझल होते पलों के साथ 
सब गलतफहमियों के धुआं होने का 


इस बार कुछ यूँ आना

के पैरों की आहट सुनकर 
दिल की धड़कन बढ़े नहीं, 
बस एक मुस्कुराहट रह जाये 
उस साँझ से उजाले तक की 
एक झांकी की तरह 


इस बार कुछ यूँ आना

के कलम उठा कर मुझे
अपनी कल्पना ना  टटोलनी पडे, 
बल्कि प्रत्येक श्वास में एहसास हो
हर वर्तमान के तुमसे प्रारंभ का 

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