या फिर डरते हो

तुम ये छोटी सी हार होते ही 
लड़ना क्यों बंद कर देते हो
ये दो कदम पीछे जाने पर
आगे बढ़ना क्यों बंद कर देते हो,
तुम यूं अपनी परछाई को 
ख़ुद पर हावी क्यों होने देते हो
या फिर डरते हो - 
के कहीं ये  साथ ना छोड़ दे, 
रोशनी मिल जाने पर? 

तुम ये कोई बात बुरी लगने पर, 
चुप क्यों हो जाते हो
अपनी कुछ बातें मनवाने को 
किसी से बहस क्यों नहीं कर पाते हो,
तुम यूं भीड़ के गलत होने पर भी 
हाँ में हाँ क्यों मिलाते हो 
या फिर डरते हो - 
के कहीं ये सब तुम्हें पलट कर ना देखें, 
ना कहने पर? 

तुम ये अपनी बात कहने से  
इतना क्यों कतराते हो
ये चुप चाप सिर्फ आंखों से ही 
कहानी क्यों लिखते जाते हो,
तुम यूं सबके सामने अपने कदम 
पीछे क्यों हटा लेते हो
या फिर डरते हो - 
के कहीं ये दूरियां बढ ना जाए, 
कुछ राज खुल जाने पर?

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